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इसी सत्र में 3 लेबर कोड पास कराने की फिराक में मोदी सरकार, ख़त्म हो जाएंगे ये श्रम क़ानून

न प्रश्न काल न शून्य काल, पीएफ़, वेलफ़ेयर फंड समेत 15 श्रम क़ानूनों को ख़त्म करने की मंशा

आगामी संसद सत्र में प्रश्न काल को समाप्त करने और शून्य काल का समय महज आधे घंटे करने को लेकर राजनीतिक गलियारे में हंगामा मचा हुआ है लेकिन मोदी सरकार इस दौरान नए क़ानूनों को मनमाना पास करवाने पर तुली हुई है।

अगले 14 सितम्बर से शुरू होने जा रहे संसद सत्र में मोदी सरकार तीन लेबर कोड पास कराने की की पूरी तैयारी में है।

इकोनॉमिक टाइम्स की ख़बर के अनुसार, श्रम और रोज़गार मंत्री संतोष गंगवार ने कहा है कि ऑक्युपेशनल सेफ़्टी, हेल्थ और वर्किंग कंडिशन कोड, सोशल सिक्युरिटी कोड और इंडस्ट्रियल रिलेशन कोड संदद में पेश किए जाएंगे।

प्रश्न काल न होने से कोई सांसद इस पर सवाल नहीं खड़ा कर सकता और शून्य काल में भी समय की सीमा होने की वजह से इस पर कोई हंगामा खड़ा हो, इसकी उम्मीद नहीं है।

लेबर कोड से देश के क़रीब 50 करोड़ संगठित और असंगठित क्षेत्र के मज़दूर प्रभावित होंगे।

उद्योगपतियों के संगठन फिक्की के एक वेबिनार में गंगवार ने बकायदा उद्योगपतियों से गुज़ारिश की कि वे बताएं श्रम क़ानूनों में क्या बदलाव किया जाना है। उन्होंने वादा भी किया कि सरकार उनकी सिफ़ारिशों पर गंभीरता से गौर करेगी।

श्रम क़ानून पर पहले से ही है मोदी सरकार की नज़र

फ़िक्की के बयान जारी कर कहा है कि श्रम मंत्री ने कहा कि श्रम क़ानूनों में बदलाव करना मोदी सरकार की सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में रहा है।

इस वेबिनार में अपनी तारीफ़ करते हुए संतोष गंगवार ने कहा कि केंद्रीय और राज्य सरकारों के न्यूनतम मज़दूरी के तहत आने वाली कैटेगरी में स्किल्ड (प्रशिक्षित) और हाइली स्किल्ड (विशेषज्ञ) की श्रेणी बनाना उनके मंत्रालय की बहुत बड़ी उपलब्धि है।

उल्लेखनीय है कि इन क़रीब 44 श्रम क़ानूनों को ख़त्म कर मोदी सरकार उनकी जगह चार लेबर कोड (श्रम संहिता) लाने जा रही है। इनमें से एक पहले ही संसद द्वारा पास किया जा चुका है।

जबकि बाकी तीन श्रम संहिताओं को भी मोदी सरकार तुरत फुरत में पास करा देना चाहती है।

केंद्रीय ट्रेड यूनियनें श्रम क़ानूनों को ख़त्म करने का पुरज़ोर विरोध कर रही हैं। उनका दावा है कि सरकार के इस कदम से पहले से ही जर्जर सामाजिक सुरक्षा, औद्योगिक सुरक्षा और बदतर काम के हालत में रह रहे मज़दूरों की कमर टूट जाएगी।

ख़त्म हो जाएंगे ये क़ानून

प्रस्तावित लेबर कोड के आने के बाद पहले के इम्प्लाई स्टेट एंश्योरेंस क़ानून, पीएफ़ एक्ट, कंपनसेशन एक्ट, मैटर्निटी बेनेफ़िट ऐक्ट, ग्रेच्युटि एक्ट, असंगठित क्षेत्र के वर्करों के लिए सामाजिक सुरक्षा एक्ट, निर्माण मज़दूरों के कल्याण के लिए वर्कर्स वेलफ़ेयर सेस एक्ट, बीड़ी वर्कर वेलफ़ेयर सेस एक्ट, आयर ओर माइंस, मैग्नीज़ ओर माइंस और क्रोम ओर माइंस वेलफ़ेयर फंड एक्ट, माइका माइंस लेबर वेलफेयर सेस एक्ट, लाइमस्टोन एंड लोटोमाइट माइंस लेबर वेलफेयर फंड एक्ट और सीने वर्कर्स वेलफ़ेयर फंड एक्ट को समाप्त कर दिया जाएगा।

सरकार का तर्क है कि इन सभी क़ानूनों को ख़त्म कर आसान क़ानून बनाए जाएंगे और इससे उद्योग धंधों को संचालित करने में उद्योगपतियों को आसानी होगी और इससे निवेश बढ़ेगा।

अब इन सभी क़ानूनों को समेट कर एक यूनिवर्सल कोड में लाने का प्रस्ताव है। इस नए क़ानून को लागू करने के लिए प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में एक नेशनल सिक्युरिटी काउंसिल बनेगी जिसके पास वित्तीय और नियामक शक्तियां होंगी।

ट्रेड यूनियनों का कहना है कि इतने अलग अलग किस्म के उद्योगों में लगे मज़दूरों के हितों की रक्षा एक काउंसिल कैसे कर पाएगी।

जैसा होता है भले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सीधे निर्देशन में ये लेबर कोड बनाए गए हों, लेकिन कई मामलों में स्पष्ट जानकारी किसी के पास नहीं है।

इसके अलावा ट्रेड यूनियनें इसलिए भी चिंतित हैं क्योंकि जिन क्षेत्रों के मज़दूरों के बारे में सरकार फैसले लेने जा रही है, उनसे या उनकी ट्रेड यूनियन प्रतिनिधियों से सरकार ने कोई भी बात करने से इनकार कर दिया है।

ट्रेड यूनियन नेताओं का कहना है कि ये मोदी सरकार की मनमानी है और इससे मज़दूरों के हालात बंधुआ मज़दूरी से भी बदतर हो जाएंगे।

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