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संसद में मार्शल, सांसद के घर आईबी और जंतर मंतर पर फ़ौज खड़ी कर पास कराए गए बिल

जो श्रम क़ानून गोरे नहीं बना पाए, उसे बनाने में मोदी सरकार ने महज 24 घंटे लिए

By संदीप राउज़ी

लोकसभा की तरह ही राज्यसभा से बुधवार को मोदी सरकार ने तीन लेबर कोड अध्यादेशों को पास करा लिया है।

बुधवार को राज्यसभा में विपक्षी दलों ने कार्यवाही का बॉयकॉट किया था। इस इन अध्यादेशों पर राष्ट्रपति के मुहर की खानापूर्ति बची है।

नए श्रम क़ानून पास कराने के मोदी सरकार के तौर तरीक़ों को लेकर काफ़ी आलोचना हो रही है क्योंकि जिस समय संसद के अंदर विपक्षी दल इस पर सवाल खड़े कर रहे थे, उसी समय जंतर मंतर पर केंद्रीय ट्रेड यूनियनों का प्रदर्शन आयोजित था।

संसद के अंदर विपक्षी दलों ने बॉयकॉट किया और विपक्ष की गैर मौजूदगी में एक ऐसा कानून पास किया जो भारत की मज़दूर किसान आबादी की आने वाली पीढ़ियों को गुलामी के जंज़ीर में जकड़ देंगी।

अगर सरल शब्दों में कहें कि इन लेबर कोड से क्या बदलाव होगा इसे एक नज़र में देखा जा सकता है-

ट्रेड यूनियन बनाना पहले मुश्किल था, अब नामुमकिन हो जाएगा, मौजूदा ट्रेड यूनियनों की एक शिकायत पर मान्यता रद्द हो सकती है, हड़ताल पर जाने की कम से कम 14 दिन पहले सूचना देनी होगी, वरना वो गैरक़ानूनी होगा, काम के घंटे नौ आधिकारिक रूप से मान्य होंगे, वेतन भत्तों की मांग अब कोई अधिकार नहीं रह जाएगा, 300 से कम मज़दूर संख्या वाली कंपनियों पर श्रम क़ानून लागू नहीं होंगे, महिलाओं से रात की पाली में भी ड्यूटी कराई जा सकेगी, ठेका मज़दूरी और संविदा की नौकरियां ही अब होंगी।

मज़दूरों के कल्याण के लिए बने तमाम बोर्डों, निधियों को ख़त्म कर दिया जाएगा। और इन सबकी जगह सिर्फ लेबर कोड से काम चलाया जाएगा। यानी जो मैनेजमेंट सरकार से कहेगा, ज़मीन पर मज़दूरों के साथ वैसा ही सलूक होगा।

अंग्रेज़ी राज़ और पुलिस स्टेट

जो पिछले 24 घंटे में इस देश में हुआ है, उसके बारे में बस इसी बात से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि श्रम क़ानूनों में कंपनियों को वो छूट दे दी गई है जिसे अंग्रेज़ी गुलामी में भी लागू किए जाने की हिम्मत गोरे नहीं जुटा पाए थे।

बहुत कम लोगों को पता होगा कि शहीदे आज़म भगत सिंह ने अंग्रेज़ों के लाए ट्रेड डिस्प्यूट बिल के विरोध में संसद में बम फोड़ने का साहस किया था।

आज़ादी के आंदोलन में भारतीय मज़दूर वर्ग ने बहुत जुझारू संघर्ष किया। रूस की मज़दूर क्रांति ने इसे और बल दिया। यहां तक कि मज़दूर वर्ग के विद्रोह से अंग्रेज़ी हुक़ूमत के भी हाथ पांव फूलने लगे थे।

उस समय दुनिया के तमाम देशों की उथल पथल और मज़बूत अंतरराष्ट्रीय मज़दूर आंदोलनों का प्रभाव बाकी देशों के पूंजीपति शासकों पर भी पड़ा और उस समय उन्हें मज़बूरन मज़दूरों को कुछ अधिकार देने पड़े।

मौजूदा समय भी कुछ ऐसा ही है, जब दुनिया के तमाम देशों में पूंजी की तानाशाही क़ायम हो चुकी है और मज़दूर आंदोलन पस्ती की हालत में हैं। इसका भी गहरा असर भारत के मज़दूर आंदोलनों पर पड़ा है।

शायद यही कारण है कि सरकार खुलेआम पूंजीपतियों के पक्ष में क़ानून पर क़ानून बना रही है, डंके की चोट पर। खुलेआम भारत सरकार का मुखिया टीवी पर झूठ बोलने से ज़रा सा भी हिचक नहीं रहा है बल्कि विपक्ष की आवाज़ का गला घोंट दिया है और अब ट्रेड यूनियन आंदोलन पर अंतिम कुल्हाड़ी चला दी है, पर मज़दूर वर्ग की ओर से कोई सशक्त आवाज़ नहीं उभर रही है।

ट्रेड यूनियन एक्टिविस्ट चंदन कुमार कहते हैं कि जिस तरह संसद में कृषि अध्यादेश और लेबर कोड अध्यादेश पास कराए गए और जिस तरह बल प्रयोग कर संसद से लेकर सड़क तक विरोधियों को धमकाया गया, ये पुलिस स्टेट की बानगी है।

ट्रेड यूनियनों के लिए सोचने का समय!

उल्लेखनीय है कि डीएमके के एक सांसद ने सदन में कहा कि उनके यहां इंटेलिजेंस ब्यूरो के लोग पहुंचे और धमकाते हुए पूछा कि वो आज सदन में क्या सवाल उठाएंगे, संसद का समय वो क्यों नष्ट कर रहे हैं आदि आदि।

उधर 23 सितंबर को 10 केंद्रीय ट्रेड यूनियनों ने जंतर मंतर पर प्रदर्शन आयोजित किया था और सुबह से ही वहां 500 से अधिक पुलिस फोर्स और अर्द्ध सैनिक बल तैनात कर दिए गए थे, जो पहले पहुंचने वाले प्रदर्शनकारियों को एक एक कर पकड़ कर थाने ले जा रहे थे।

यहां तक कि धरना स्थल पर जब ट्रेड यूनियनों के नेताओं के सामने कार्यकर्ताओं को पुलिस धमकी दे रही थी। एक बार तो ऐसी स्थिति आई कि बीच भाषण में पुलिस अधिकारी माइक से सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करने की घोषणा करने लगा।

एक्टू से जुड़े एक ट्रेड यूनियन कार्यकर्ता ने बताया कि पुलिस की गिरफ़्तारी से बचने के लिए वो अपने साथियों के साथ दूर खड़े रहे।

मज़दूरों को अपना समर्थन देने पहुंचे एक ट्रेड यूनियन कार्यकर्ता एवं मीडियाकर्मी ने बताया कि उनके सामने पुलिस लोगों को पकड़ रही थी, किसी तरह वो अपना प्रेस का कार्ड दिखाकर बचे।

ट्रेड यूनियनें भारतीय संविधान में दिए गए लोकतांत्रिक अधिकारों के तहत कार्यवाही करती हैं लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि 2020 के मानसून सत्र ने लोकतंत्र की तस्वीर पर माल्यार्पण कर उसकी विदाई पर मुहर लगा दी है!

बीते तीन चार दिन भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का काला दिन है, जब उस बहुसंख्यक आबादी की तक़दीर लिख दी गई, बिना उसका पक्ष सुने, बिना उनकी राय लिए। किसानों और मज़दूरों का शोषण अब क़ानूनी हो जाएगा, अब शोषण कोई ख़बर नहीं रह जाएगी।

इंसाफ़, न्याय, तर्क, तकाज़ा, संवैधानिकता, क़ानून अब गिरवी हो चुके हैं, सिर्फ वेतन भत्ते पर मज़दूरों को गोलबंद करने की ट्रेड यूनियनों की रणनीतियां कितनी सफल हो पाएंगी, अब बस ये सोचने की बात रह गई है।

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