एक ज़रूरी फ़िल्म ‘चिल्ड्रेन ऑफ हैवेन’; मासूमियत की खुशबू के 25 साल

एक ज़रूरी फ़िल्म ‘चिल्ड्रेन ऑफ हैवेन’; मासूमियत की खुशबू के 25 साल

By मनीष आजाद

बच्चों की मासूम दुनिया को ध्वस्त करके ही हम बड़ों की ‘समझदार’ दुनिया बनी है। लेकिन अक्सर ही हम इस ‘समझदारी’ से इतना ऊब जाते हैं कि ताजी हवा के झोंके के लिए बच्चों की दुनिया में झांकने पर विवश हो जाते हैं।

आज से ठीक 25 साल पहले आयी ‘मजीद मजीदी’ की मशहूर ईरानी फ़िल्म ‘चिल्ड्रेन ऑफ हैवेन’ हमारे सामने स्क्रीन पर वही खिड़की खोलती है, जिसमे बच्चों की मासूम दुनिया बड़ों की ‘समझदार’ दुनिया से बेपरवाह अपनी मासूमियत की खुशबू बिखेरती है।

कहानी भी बेहद मासूम है।

9 साल का ‘अली’ अपनी 6 साल की प्यारी बहन ‘जाहरा’ का गुलाबी जूता उसकी मरम्मत कराने के दौरान बाजार में कहीं खो देता है। गरीबी के कारण यह बात माँ पिता को नहीं बतानी है। घर का 5 माह का किराया अभी बाकी है। माँ पिता परेशान हैं।

जाहरा दुःखी तो होती है, लेकिन मान जाती है। अब अली के जूते से ही दोनों को काम चलाना है।

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Children of heaven film scene

जूता

शुक्र है कि जाहरा का स्कूल सुबह और अली का दोपहर में है। फिर भी अली को समय पर जूते देने के लिए जाहरा को दौड़ लगानी पड़ती है। अक्सर अली को इस कारण स्कूल में देर हो जाती है। प्रिंसिपल की डांट खानी पड़ती है।

अली और जाहरा पूरी फिल्म में लगातार दौड़ते रहते हैं।

किसी फिल्म में दौड़ना भी इतना खूबसूरत हो सकता है, इस फ़िल्म को देखने से पहले सोचना मुश्किल था। आखिर इंसान ने भी तो दौड़ते दौड़ते ही यहां तक की यात्रा की है।

भाई-बहन के बीच प्यार और झगड़े के मीठे दृश्य बरबस रूला देते हैं और हमारी सारी कलुषता आसुओं में बह जाती है।

इसी बीच अली के स्कूल में दौड़ की प्रतियोगिता होती है। अली को तो रोज ही दौड़ने का अभ्यास है। तीसरे नम्बर पर जो आएगा उसे जूता मिलेगा।

अली को अपनी प्यारी बहन के लिए यही तो चाहिए। वह इस निश्चय से प्रतियोगिता में भाग लेता है कि उसे तो 3rd ही आना है।

Ist और 2nd न आने की जद्दोजहद में वह कभी आगे, कभी पीछे होता है। और क्लाइमेक्स में न चाहते हुए भी वह 1st आ जाता है।

इस रेस के कारण अली और जाहरा के बीच का एकमात्र जूता भी फट जाता है। गरीबी में आटा गीला।

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क्लाईमेक्स

अली हैरान और दुःखी है कि यह कैसे हुआ। जूता उसकी गिरफ्त से छूट चुका है। प्रिंसिपल ने उसे कंधे पर उठा लिया। उसे एक चमकती ट्राफी थमा दी।

कैमरे की लाइट चारो ओर से उस पर हमला बोलने लगी। लेकिन अली के चेहरे पर तो अंधेरा है।

बहुत ही सशक्त और दिल को भर देने वाला दृश्य है यह।

अंतिम दृश्य में दुःखी भाई और बहन घर के छोटे पौंड में पैर डाल कर चुपचाप बैठे हुए हैं और छोटी छोटी रंग-बिरंगी मछलियां अली के पैरों को चूम रही हैं, मानो पैरों की थकान खींच रही हों, अली और जाहरा के आसुओं को पी रही हों।

अली का दर्द कोई नहीं समझता शायद ये छोटी मछलियां समझती हैं। कम से कम एक बार दुनिया को बच्चों की नज़र से देखने की जरूरत है।

इसलिए कम से कम एक बार ‘चिल्ड्रेन ऑफ हैवेन’ देखने की जरूरत है।

यह फ़िल्म ‘यू ट्यूब’ पर उपलब्ध है।

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