न्याय को एक और ठोकरः बंधुआ मजदूरों के खिलाफ दिया फैसला, याचिकाकर्ता को ‘गिरोह चलाने वाले’ कहा

न्याय को एक और ठोकरः बंधुआ मजदूरों के खिलाफ दिया फैसला, याचिकाकर्ता को ‘गिरोह चलाने वाले’ कहा

सुप्रीम कोर्ट ने एक और निष्ठुरता दिखाते हुए बंधुआ मजदूरों के हक में आवाज उठाने वाले याचिकाकर्ता को खरी खोटी सुनाते हुए देश में बंधुआ मज़दूर होने की बात से ही मना कर दिया।

बुधवार को सुनवाई के दौरान सर्वोच्च अदालत के जज हेमंत गुप्ता ने कहा कि देश में बंधुआ मजदूर के बहाने रैकेट (गिरोह) चलाया जा रहा है और ऐसे लोग इस बंधुआ मज़दूरी जैसी बात का फायदा उठा कर पैसा खा रहे हैं।

ये टिप्पणी सामाजिक अधिकार कार्यकर्ता दिवगंत स्वामी अग्निवेश द्वारा सन 2012 में  दायर याचिका की सुनवाई के दौरान कही गई। स्वामी अग्निवेश बंधुआ मुक्ति मोर्चा के संस्थापक रहे हैं और सैकड़ों बंधुआ मजदूरों को छुड़ाया है।

स्वामी अग्निवेश से जुड़े रहे और बंधुआ मुक्ति मोर्चा के पदाधिकारी रहे निर्मल गोराना ने सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को न सिर्फ दुर्भाग्यपूर्ण बताया बल्कि इसे देश के अंतिम व्यक्ति के खिलाफ भी करार दिया।

बीते कुछ महीनों में सुप्रीम कोर्ट ने कई ऐसे विवादास्पद फैसले दिए हैं, जिसमें जनहित याचिकाकर्ता पर ही जुर्माना लगाया गया या गिरफ्तार होना पड़ा जिसमें तीस्ता सीतलवाड़ और हिमांशु कुमार का मामला प्रमुख है।

तीस्ता ने 2002 में हुए गुजरात दंगों में पीड़ितों के पक्ष से याचिका दायर की थी। जबकि हिमांशु कुमार ने छत्तीसगढ़ के गोमपाड़ मामले की जांच की मांग की थी। तीस्ता के खिलाफ फैसला देने के बाद उनकी गिरफ्तारी हो गई जबकि हिमांशु कुमार पर पांच लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया और उन्होंने इसे देने से इनकार कर दिया।

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सुप्रीम कोर्ट के ही खिलाफ चले गए जस्टिस गुप्ता

निर्मला गोराना जोकि इस समय निर्मल गोराना नैशनल कैंपेन कमेटी फॉर इरेडिकेशन ऑफ बॉन्डेड लेबर के संयोजक हैं, ने कहा कि देशभर में हजारों ऐसे मामले हैं जहां पर मजदूरों को नियोक्ता द्वारा काम की एवज में उचित दाम नहीं दिया जाता है। बंधुआ मजदूरी की प्रथा बहुत सदियों पुरानी है। प्राचीन काल में जमीदारों के घर एवं खेत खलिहानो से शुरू हुई बंधुआ मजदूरी की प्रथा गुलामी का एक प्रकार है जो आजादी के 75 वर्ष बाद भी समाज में व्याप्त है।

बंधुआ मजदूरी के खात्मे हेतु 1976 में बंधुआ मजदूरी प्रथा उन्मूलन अधिनियम भारत में पारित किया गया। इसके पश्चात सुप्रीम कोर्ट ने बंधुआ मुक्ति मोर्चा बनाम भारत सरकार एवं पीयूडीआर बनाम भारत सरकार के मामले में ऐतिहासिक फैसला दिया जिसमें नाम मात्र की मजदूरी अर्थात न्यूनतम मजदूरी की दर से कम रेट पर काम करने वाले मजदूर को बंधुआ मजदूर माना गया।

यह फैसला जस्टिस पीएन भगवती ने 1982 में दिया। आज उसी फैसले के ऊपर सुप्रीम कोर्ट के न्यायधीश हेमंत गुप्ता ने इसे असंवैधानिक, महिला बंधुआ मजदूर विरोधी फैसला देकर गरीब से न्याय की उम्मीद को ही खत्म करने की पहल की है।

निर्मल गोराना बताते हैं कि साल 2012 में को उन्हें जम्मू के ईंट भट्टों में बंधुआ मजदूरों की जानकारी मिली। जिसके बाद बंधुआ मुक्ति मोर्चा के एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर होने की नाते तत्काल ही पीड़ित राजकुमारी के पति के साथ वो जम्मू पहुंचे।

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वहां निर्मल गोराना ने 51 बंधुआ मजदूरों को राजकुमारी सहित मुक्त करवाया। जम्मू के उपायुक्त ने 51 बंधुआ मजदूरों को मुक्ति प्रमाण पत्र देकर जम्मू से छत्तीसगढ़ जिला जांजगीर चांपा भेजा।

निर्मल गोराना ने बताया कि घर वापसी में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह के साथ बंधुआ मजदूरों की बैठक हुई जिसमें रमन सिंह ने बंधुआ मजदूरों के पुनर्वास का आश्वासन दिया।

लेकिन बंधुआ मुक्ति का प्रमाण पत्र पाकर मजदूर आज भी पुनर्वास की आस लगाए बैठे हैं ।

इसी मामले में बंधुआ मुक्ति मोर्चा के अध्यक्ष दिवंगत स्वामी अग्निवेश ने सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका फाइल की। इसी जनहित याचिका में जस्टिस हेमंत गुप्ता ने अचानक बंधुआ मजदूरों को बंधुआ न मानते हुए असामाजिक तत्वों के द्वारा चलाए गए गिरोह का हिस्सा बता डाला।

निर्मल गोराना ने बताया कि इस मामले में न केवल बंधुआ मजदूरी का बल्कि महिला के साथ लैंगिक अपराध एवं मानव तस्करी का मामला भी जुड़ा हुआ है साथ ही स्टेट बंधुआ मजदूरों को मुक्ति प्रमाण पत्र जारी करके बंधुआ होने का प्रमाण दे चुका है। न ही कोर्ट के पास ऐसा कोई प्रमाण है जिससे पैसा बनाने के गिरोह की बात सत्यापित हो।

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वो कहते हैं कि 2016 में बंधुआ मजदूरों के पुनर्वास हेतु योजना बनाई गई जिसमें करोड़ों रुपए का अनुदान निहित हैं फिर देश में बंधुआ न होने की बात पर संदेह नहीं किया जा सकता है।

जबकि जस्टिस जस्टिस हेमंत गुप्ता ने बंधुआ मजदूरों के अधिकार पर हमला बोला है ये फैसला सामाजिक न्याय का अंत करेगा जबकि देश में गुलामी के मामले लगातार बढ़ते जा रहे हैं।

गोराना ने कहा कि जस्टिस हेमंत गुप्ता के इस फैसले का कड़ा विरोध जताएंगे और चीफ जस्टिस ऑफ इण्डिया एवं यूनाइटेड नेशन को पत्र लिखेंगे।

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